AI खा जाएगा Websites? ChatGPT ने क्या पकड़ा जो दुनिया डरी? Banks End Game शुरू? Claude

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Vídeo em Hindi, publicado pelo canal News Pinch.

इस सामग्री के बारे में: नीचे दिया गया सारांश, मुख्य बिंदु और विषय वीडियो की ट्रांसक्रिप्ट से स्वचालित रूप से तैयार किए गए हैं। वे वीडियो में प्रस्तुत सामग्री, राय, दावों और भविष्यवाणियों को दर्शाते हैं और IA Dots की ओर से किसी समर्थन, सत्यापन या तथ्य-जांच का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं।

वीडियो सारांश

वीडियो में दुनिया भर में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और साइबर हमलों से जुड़ी चिंताओं पर चर्चा की गई है। इसमें बताया गया है कि कैसे एआई ने 70% से अधिक वेबसाइटों द्वारा उपयोग की जाने वाली पीएचपी प्रोग्रामिंग भाषा में सुरक्षा कमियों को उजागर किया है, जिससे अमेरिका, यूरोप और जापान में कई संस्थाओं को अपनी वेबसाइटों को ऑफ़लाइन करना पड़ा। इसके अलावा, वित्तीय संस्थानों, बैंकों और भारत के स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) में डेटा लीक के मामलों और एआई एजेंटों के बढ़ते खतरे का जिक्र किया गया है.

मुख्य बिंदु

  • एआई और साइबर हमलों के कारण दुनिया भर के कई देशों में सरकारी, बैंकिंग और शैक्षणिक संस्थानों ने अपनी वेबसाइटों को अस्थायी रूप से ऑफ़लाइन कर दिया है।
  • लगभग 70% वेबसाइटों द्वारा उपयोग की जाने वाली पीएचपी भाषा में सुरक्षा कमियों को एआई एजेंटों द्वारा खोजा गया है।
  • एन्थ्रोपिक और स्पेसएक्स के मॉडलों का उपयोग करने वाले हैकिंग समूहों ने लैटिन अमेरिका में वित्तीय और तकनीकी कंपनियों पर स्वचालित साइबर हमले किए हैं।
  • अमेरिकी बैंकों को यह पहचानने में कठिनाई हो रही है कि बैंक खातों का संचालन वास्तविक उपयोगकर्ताओं द्वारा किया जा रहा है या एआई एजेंटों द्वारा।
  • एसबीआई के ग्राहकों का डेटा डार्क वेब पर उपलब्ध होने की खबरें सामने आई हैं, हालांकि बैंक ने इसकी जांच शुरू कर दी है और ग्राहकों का बैलेंस सुरक्षित बताया है।

विषय

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंससाइबर सुरक्षाडेटा लीकबैंकिंग सिस्टमपीएचपी प्रोग्रामिंगवेबसाइट ऑफ़लाइनएसबीआई डेटा
वीडियो का ट्रांसक्रिप्ट

उपलब्ध कैप्शन का पाठ; इसमें त्रुटियाँ हो सकती हैं।

एआई को लेकर जो डर बताया जा रहा था उसके सच साबित होने की तरफ क्या हम कदम बढ़ा चुके हैं? भविष्यवाणियां सही साबित होने लगी हैं। सारी [संगीत] चिंताएं जायज सी लगने लगी है। क्या सच में एंड गेम शुरू हो चुका है? हाल ही में जो घटनाएं हो रही हैं उनसे दुनिया का पूरा सिस्टम हिल गया है। बैंकिंग सिस्टम, सरकारी वेबसाइट्स [संगीत] कुछ भी नहीं बच रही हैं। बैंकों के डाटा लीक होने की खबरें आ रही हैं। अमेरिका, फ्रांस, डेनमार्क जैसे देशों में सरकारें, विश्वविद्यालय, अस्पताल जैसे संस्थान अपनी वेबसाइटों को ऑफलाइन कर रहे हैं। यानी इंटरनेट से हटा दे रहे हैं। जापान के वित्त मंत्रालय से संबंधित वेबसाइट्स यूएस का एचआर प्लेटफार्म बमबू एचआर नीदरलैंड्स के पोर्ट ऑफ रोटर डैम की वेबसाइट विकपीडिया को चलाने वाले [संगीत] विकीडिया फाउंडेशन की वेबसाइट्स को ऑफलाइन करना पड़ा। जापान के प्रधानमंत्री समेत दुनिया के कई लीडर्स ने वेबसाइट [संगीत] से कहा है कि अपनी सिक्योरिटी अपग्रेड कर लो। अमेरिका की नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी और यूरोपीय साइबर सिक्योरिटी एजेंसी ने एडवाइज़री जारी कर वेबसाइटों से कहा है कि ठीक कर लो वरना गड़बड़ हो जाएगी। डाटा सेंटर्स के मजबूत ताले यानी सिक्योरिटी पासवर्ड हैक कर [संगीत] लिए जा रहे हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने वेबसाइटों की बहुत बड़ी कमी पकड़ जो ली है और इस कमी से दुनिया की 70% वेबसाइट 70% वेबसाइट्स हैक हो चुकी है। हर तरफ खौफ का आलम है और दुनिया भर हैक की खबरें आ रही हैं। ऐसा ही डर भारत भी पहुंच चुका है। देश का सबसे बड़ा पब्लिक सेक्टर बैंक है एसबी। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के हजारों कस्टमर्स [संगीत] का डाटा लीक हो गया है। डार्क वेब पर अकाउंट डिटेल्स मिली है। SBI ने खुद यह बात मानी है। SBI नहीं अमेरिका के बड़े बैंकों को समझ नहीं आ रहा है कि उनके बैंक खाते ग्राहक [संगीत] चला रहा है कि एआई से मुसल है। बहुत कुछ हो रहा है दुनिया में। और अब हालत यह है कि कल को आपका बैंक खाता साफ हो जाए। बैंक सिस्टम हैक हो जाए या किसी बड़ी वित्तीय संस्था पर साइबर हमला हो जाए। ऐसी कई आशंकाएं सामने आई। कुछ-कुछ वैसे ही हालात हो रहे हैं जब दुनिया भर में कोरोना फैल रहा था और किसी देश को समझ ही नहीं आ रहा था कि करें तो करें क्या? बस डर फैल रहा था। वैसे डर एआई के मामले में फैल रहा है। पर क्या यह डर सही है? कहां क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है और कैसे इससे निपटा जा रहा है? इस वीडियो में आपको इसी पर विस्तार से बताएंगे, समझाएंगे और यह बहुत जरूरी बातें हैं। ध्यान से सुनिएगा और आखिर तक भी जरूर सुनिएगा। नमस्ते मेरा नाम है सौरव त्रिपाठी और आप न्यूज़ पिंच देख रहे हैं। एआई से कोई भी सुरक्षित नहीं है। दुनिया के वो देश जो खुद को तकनीक के मामले में सबसे आगे मानते हैं। जो अपनी तकनीक दुनिया को बेच रहे हैं वो भी एआई से सुरक्षित नहीं है। कैसे बताते हैं। इस पूरे हफ्ते आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने अमेरिका जैसे देशों की संस्थाओं को खूब डरा रखा। इतना ज्यादा कि सैकड़ों वेबसाइट्स को ऑफलाइन कर दिया गया। ब्रिटेन की काउंसिलों, मेट्रोपॉलिटन पुलिस और यूरोप भर की सरकारों की वेबसाइटें 21 अक्टूबर को बंद कर दी गई। नीदरलैंड के साइबर सुरक्षा केंद्र ने एतिहाद के तौर पर अपनी साइट खुद बंद कर दी। फिनलैंड की सरकारी आईटी एजेंसी और जर्मनी की संघीय आईटी एजेंसी ने भी कई सेवाएं बंद की। अब हुआ क्या है? आसान तरीके से समझाते हैं। मान लीजिए दुनिया की वेबसाइट्स का डाटा अपनी-अपनी तिजोरी में जमा होता है। उस तिजोरी पर एक ताला लगा है। लगभग 70% वेबसाइटों की तिजोरियों पर एक ही ब्रांड का ताला लगा है। आज तक उस ताले को कोई खोल नहीं पा रहा था। इसलिए सुरक्षित इसे माना जा रहा था। लेकिन अब एआई के एजेंट्स ने तालों की इस कमी को पकड़ लिया है और झटपट खोलने लगे हैं। उस ताले का नाम है पीएचपी। और ताले कमी या वक्त का नाम है पीएपी टू शेल। तो दुनिया में जितनी भी वेबसाइट्स में पीएपी काम में लिया जा रहा है उनको हैक करना संभव है। पर ये तो आसान तरीके से आपको समझाने के लिए बताया। तकनीकी रूप में असल में क्या गड़बड़ी हुई वो भी समझाते हैं। ये सब हुआ पीएपी में गड़बड़ी से। पीएपी एक प्रोग्रामिंग भाषा है। ये मुख्य रूप से वेबसाइट और वेब एप्लीकेशन बनाने के लिए इस्तेमाल होती है। साल 1995 से पीएपी भाषा काम में ली जा रही है। पहले इसका पूरा नाम हुआ करता था पर्सनल होम पेज और शॉर्ट फॉर्म में पीएपी। फिर नाम बड़ा कर दिया गया और पीएपी हाइपर टेक्स्ट प्री प्रोसेसर कर दिया गया। इन तीनों शब्दों के पहले अक्षर पीएपी है। इसलिए इसकी नई शॉर्ट फॉर्म पहले जैसे ही रहेगी। मान लीजिए आप बैंक या किसी अन्य वेबसाइट पर लॉगिन करते हैं। आप अपना यूजरनेम और पासवर्ड डालकर बटन दबाते हैं। अब कोई तो चाहिए जो आपका यूजरनेम, पासवर्ड जांचे डेटाबेस में देखे कि आप सही यूजर हैं या नहीं। सही होने पर आपका प्रोफाइल पेस्ट दिखाए। ये सारा लेखाजोखा चित्रगुप्त के खाता बही में लिखा होता है। चित्रगुप्त यानी सर्वर। सर्वर यानी डेटा सेंटर के कंप्यूटरटर्स। बड़े-बड़े डेटा सेंटर्स के कंप्यूटरों या सर्वर्स में वेबसाइट का सारा डाटा जमा होता है। यूजरनेम, पासवर्ड से लेकर प्रोफाइल चेक करने का सारा काम सर्वर पर होता है। और सर्वर वो भाषा नहीं समझता जो आप अपने फोन या कंप्यूटर में टाइप करते हैं। आपका ब्राउज़र जावा स्क्रिप्ट में काम करता है। लेकिन सर्वर पीएपी भाषा समझता है। इसलिए पीएपी को सर्वर साइड लैंग्वेज कहते हैं। एक बार फिर समझिए। जैसे ही आप Google या SAR जैसे ब्राउज़र में किसी वेबसाइट का पेज खोलते हैं, आपके रिक्वेस्ट सर्वर तक जाती है। सर्वर पीएपी कोड चलाता है। जरूरत हो तो डेटाबेस से डाटा लेता है। पीएपी का रिस्पांस HTML या हाइपर टेक्स्ट मार्कअप लैंग्वेज बनाकर आपके ब्राउज़र में वो आता है। आपको सिर्फ तैयार पेज दिखता है। पीएपी कोड नहीं दिखता। तो ब्लॉग, न्यूज़ वेबसाइट्स, ई-कॉमर्स साइट्स, स्कूल, कॉलेज के मैनेजमेंट सिस्टम आदि कई कामों के लिए पीएपी काम में लिया जाता है। इन कामों के लिए और भी भाषाएं हैं। लेकिन पीएपी ओपन सोर्स है और फ्री है। इसलिए काम में ये लगातार ली जा रही है लंबे समय से और 70% वेबसाइट इसी भाषा में काम लेती है। तो चैट जीपीटी के मालिक ओपन एआई वेब सिस्टम का सिक्योरिटी सिस्टम चेक करने के लिए कमियां ढूंढ रही थी और उनके एआई ने ऐसी कमियां निकाल कर दे दी कि अधिकतर लोग इसके घेरे में आ गए। पर अब तक ऐसा नहीं है कि इस कमी की वजह से कोई डाटा चोरी हुआ है या कोई फाइनेंशियल फ्रॉड हो गया है। अब तक नहीं हुआ है लेकिन हो सकता है। एआई ने कमी खोज कर बता दी है। बता दिया है कि आपकी तिजोरी की सिक्योरिटी में यह दिक्कत है। ठीक कर लो वरना लुट जाओगे। अब ओपन एआई Google की साइबर सिक्योरिटी कंपनी विज़ और अन्य साइबर सिक्योरिटी कंपनी कैलिफ लगी है कि इन कमियों को ढूंढा जाए और ठीक किया जाए। अब एक चीज और समझिए कि जो पीएपी प्रोग्रामिंग 1995 से काम में ली जा रही है वो दुनिया का कोई तगड़ा हैकर हैक नहीं कर पाया लेकिन एआई ने कर दिया। यही स्किल तो एआई को ताकतवर और खतरनाक बनाता है। इस बात को गंभीरता समझिएगा। मान लो एक तगड़ा हैकर है। उसको हैकिंग के 500 कोड मालूम है। लेकिन एi तो 5000 या 5 लाख तरीके के पैटर्न याद रख सकता है और वो मजबूत से मजबूत सिस्टम हैक कर सकता है। और उनमें से कोई एक पैटर्न काम कर जाए और वेबसाइट हैक जैसा कि पीएपी के मामले में हुआ भी। पर पीएपी में कमी तो एक मामला है। उसके अलावा भी एआई हजारों तरह के और हमले कर रहा है। हाल ही में लैटिन अमेरिका में बैंक और पेमेंट कंपनियों पर कई साइबर हमले हुए। साइबर कार्टिल नाम के एक हैकिंग समूह ने कई बड़ी टेक कंपनियों के एआई एजेंट्स का इस्तेमाल करके लैटिन अमेरिका के कारोबारों पर साइबर हमले ऑटोमेटिक तरीके से किए। इसमें एंथ्रोपिक के क्लॉट और स्पेस एक्स के ग्रोक जैसे मॉडल वाले एजेंट्स का जाल इस्तेमाल हुआ और 400 से ज्यादा निशाने बनाए गए। दुनिया भर में सबसे ज्यादा निशाना वित्तीय संस्थाओं को बनाया जा रहा है और इसमें एआई हैकर्स का तगड़ा हथियार साबित हो रहा है। इस खेल में अमेरिका के बैंक भी सुरक्षित नहीं दिख रहे हैं। अमेरिका के मॉर्गन स्टैनली, बैंक ऑफ अमेरिका, जेपी मॉ्गन, विल्स फ्गो जैसे बड़े बैंकों के होश उड़े हुए हैं। घबराए हुए हैं वो। ऐसा नहीं है कि एआई अमेरिकी बैंकिंग सिस्टम में घुसकर कोई फ्रॉड कर रहा है। वहां तक नहीं पहुंचेंगे अभी। मगर उससे कुछ कदम दूर है। पर इसके जितने करीब वह पहुंच गए हैं, वह भी पर्याप्त डराने वाला है। एआई फिलहाल बैंकों के खाता धारकों के खाते ऑपरेट करा है। यूजर की जगह एआई खातों में लेनदेन कर रहे हैं। उदाहरण समझाते हैं आपको। मान लीजिए मेरा कोई एआई एजेंट है या न्यूज़प का कोई एआई एजेंट है जिससे बैंक का आईडी पासवर्ड देकर कह दिया जाए कि खातों में सभी एंप्लाइज के खातों पर सैलरी ट्रांजैक्शन कर दो। मतलब जो काम आदमी कर रहा है वह एआई से करवा लें। अब एआई एजेंट इस काम के लिए बैंक के बोर्ड या एआई एजेंट से कम्युनिकेशन करेगा। अगर कुछ दिक्कत आई तो कॉल सेंटर से संपर्क करेगा। ये सब इतना तेज हो रहा है कि बैंक वाले कुछ समझ ही नहीं पा रहे हैं। तो बैंकों के साथ दिक्कत ये आ रही है कि वो पहचान ही नहीं पा रहे हैं कि खाता किसी यूजर के कहने पर ऑपरेट हो रहा है या एआई एजेंट कर रहे हैं। एआई एजेंट अगर अपने मन से खाता ऑपरेट कर रहे हैं तो यह दिक्कत का सबब है। क्योंकि कभी साइबर अटैक होने पर भी एआई खातों को ऑपरेट कर सकता है और बैंकों को पता ही नहीं चलेगा। इसीलिए बैंक अपने बोट या एआई तकनीक को ही ब्लॉक कर रहे हैं। कई बैंक यह पहचान नहीं पा रहे हैं कि खाते की गतिविधि यूजर के निर्देश पर हो रही है या एजेंट अपने आप काम कर रहा है। ज्यादातर बैंक रीड ओनली एक्सेस की ओर बढ़ रहे हैं। यानी एजेंट जानकारी देख सकेगा पर कोई कार्यवाही नहीं कर सकेगा। बैंक मानते हैं कि ग्राहक भविष्य में एजेंट्स का इस्तेमाल करना चाहेंगे। पर अभी ज्यादा छूट देना बहुत जोखिम भरा है। बैंक अब थर्ड पार्टी एआई एजेंट्स को ब्लॉक कर रहे हैं। नियमों में बदलाव कर रहे हैं। यह खबर इस बात का प्रमाण नहीं है कि एआई ने अमेरिकी बैंकों के सर्वर हैक कर लिए या ग्राहकों का पैसा चुरा लिया। हम भी ऐसा नहीं कह रहे हैं। लेकिन असली चिंता यह है कि बैंकिंग सेवाओं में एआई का दखल बढ़ गया है। एआई की नियत पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। वो बैंक अकाउंट चला रहा है। लेकिन कब तक आपके कहे अनुसार ही चलाएगा? कुछ गड़बड़ नहीं करेगा। इसकी क्या गारंटी है और यही डर अमेरिकी बैंकों को भी सता रहा है। बैंकों के अलावा भी जहां कमजोर सिस्टम दिख रहा है एआई से हमले वहां पर हो रहे हैं। अमेरिकी शिक्षा विभाग की वेबसाइट पर भी हाल ही में एआई एजेंट्स की गड़बड़ी देखी गई। वेबसाइट पर स्कूलों से संबंधित आंकड़े खोजने के दौरान एआई एजेंट्स ने असामान्य रूप से बड़ी संख्या में अनुरोध भेजे और एक संभावित एसक्यूएल इंजेक्शन प्रयास भी किया। एसक्यूएल इंजेक्शन एक ऐसा हमला है जिसमें वेबसाइट के इनपुट से डेटाबेस संबंधी निर्देशों का दुरुपयोग करने की कोशिश की जाती है। मतलब गलत तरीके से डाटा निकालने की कोशिश की जाती है। शिक्षा विभाग की जो जानकारी पब्लिक के लिए उपलब्ध नहीं थी एआई एजेंट्स ने वो भी निकालने की कोशिश की। इसको यूं समझिए कि अब तक हम Google पर कुछ सर्च करते हैं और जितनी सूचना पब्लिकली उपलब्ध है Google या कोई और ब्राउज़र हमें उतनी ही सूचना दे देता है। लेकिन एआई एजेंट्स के मामले में कोई सीमा नहीं है। ये वो सूचना भी खोज कर लाना चाहते हैं जो प्रतिबंधित है। मिसाल के तौर पर हमने अगर किसी आदमी की सूचना मांगी लेकिन एआई उसकी निजी जानकारी जो प्रोटेक्टेड है वो भी ला दे रहा है। यही गंभीर चिंता का विषय है। एआई एजेंट्स को अगर किसी पुराने सार्वजनिक रिकॉर्ड को खोजने का काम दिया जाए तो वह अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए ऐसे तरीके आजमा सकता है या रिक्वेस्ट कर सकता है जो वेबसाइट की सुरक्षा सीमाओं के खिलाफ हो। इसीलिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि एजेंट्स कौन सा परिणाम खोज रहा है। यह देखना भी आवश्यक है कि वो उस परिणाम तक पहुंचने के लिए कौन से तरीके अपना रहा है। एआई के खतरे पर दुनिया के बाद अब देखते हैं हमारे देश हिंदुस्तान के हाल। भारत की राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा एजेंसी सीआरटी इन ने एआई एजेंट्स को अन अधिकृत एक्सेस और वित्तीय संस्थाओं के भुगतान ढांचे पर हमलों से संबंधित अलग-अलग अलर्ट हाल ही में जारी किया। पर अलर्ट अपनी जगह है और साइबर सुरक्षा अपनी जगह सेंध लगाई गई एसबीआई बैंक के डाटा में 16 अक्टूबर को एसबी की अपनी थ्रेट इंटेलिजेंस सेवा देने वाली कंपनी डिफेंस साइबर एजेंसी और सीईआरटी से अलर्ट मिले कि ग्राहकों का डाटा डार्क वेब पर उपलब्ध है। 16 अक्टूबर को सीयज्म नाम के एक यूजर ने हैकर फोरम पर पोस्ट डाली कि उसके पास एसबीआई से चुराया डाटा है। उसने 3.75 लाख पंक्तियों और 2700 से ज्यादा दस्तावेजों का दावा किया जिसमें लोन आवेदन, खाता खोलने के दस्तावेज और पते जैसी निजी जानकारी बताई गई। इस साइबर सिक्योरिटी में बहुत बड़ा लैप्स है। बैंकों का डाटा अक्सर सेफ्टी प्रूफ माना जाता है। लेकिन हैकर्स ने वो डाटा चुरा लिया। एसबीआई में आपके अकाउंट की जानकारी, आपके लोन की जानकारी मतलब वो जानकारी जो या तो आप जानते हैं या आपका बैंक वो सब हैकर्स के पास है। ऐसे दावे सामने आए हैं। इस बारे में बैंक ने कहा है कि उसे अभी पता नहीं है कि डाटा कहां से आया। इसकी जांच के लिए उसने सीईआरटी इन से मान्यता प्राप्त एक एजेंसी को लगाया हुआ है। इस बात की पुष्टि नहीं है कि डाटा कैसे हासिल हुआ, कितना नया है या किसी पुराने लीक का है। ग्राहकों के लिए नोटिस में बैंक ने कहा कि इस घटना का असर बहुत ही कम ग्राहकों पर पड़ा है। नोटिस में यह भी लिखा है कि ग्राहकों का बैलेंस पूरी तरीके से सुरक्षित है और वह ग्राहकों के हित में रक्षा के लिए अन्य संभव कदम उठा रहा है। ग्राहकों को सलाह है कि ओटीपी, पिन या पासवर्ड किसी से साझा ना करें। करेंगे तो हम भी कहेंगे भैया ओटीपी पिन पासवर्ड किसी से साझा ना करें बिल्कुल ना करें इस तरह की रिपोर्ट भी नहीं मिली कि किसी ग्राहक के अकाउंट से पैसा निकल गया वैसे बैंक का दबाव है पर हम उस दिन का इंतजार नहीं कर सकते ये जितना हो रहा है वो पर्याप्त बहुत डरावना है हालांकि एसबीआई वाले मामले में सीधे-सीधे एआई का लिंक नजर नहीं आ रहा है लेकिन हमने आपको दुनिया के बाकी उदाहरण भी दिए पहले बैंकों में पैसा इसलिए रखा जाता था कि वहां बेहतर सुरक्षा है कोई चुरा नहीं सकता है लेकिन एआई और साइबर क्राइम के दौर में सब उल्टा हो रहा है। अब ऐसा महसूस हो रहा है कि डिजिटल बनने की दौड़ हमने बहुत तेज दौड़ ली है। अपनी सुरक्षा भी ध्यान में रखनी चाहिए थी। आगे क्या होगा? इस सुरक्षा के ख्याल पर चिंता होगी नहीं होगी, बहस होगी नहीं होगी? एआई में जो जरूरी बदलाव हैं वो होंगे या फिर सिर्फ एआई के बिजनेस में आगे बढ़ने की अंधी दौड़ जारी रहेगी और ऐसे खतरे आए दिन हमारे सामने यूं ही आते रहेंगे। और जो एंड गेम का खतरा हमें दिखाया गया है वो सच के करीब क्या जाता रहेगा। नजर हमारी भी है। आप भी रखिएगा, ख्याल भी रखिएगा। यह भी बताइएगा कि आपको ये वीडियो पूरा कैसा लगा और ऐसे हमें और वीडियोस करने चाहिए क्या? ऐसी तमाम खबरें बाकी हम आप तक लाते रहेंगे। मेरा नाम सौरभ त्रिपाठी है। कैमरे पीछे अनुराग है। चैनल अब तक सब्सक्राइब नहीं किया है न्यूज़ तो प्लीज कर दीजिएगा ताकि हम और बेहतर काम लगातार आपके लिए करते रह। शुक्रिया। [संगीत] आ

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Assuntos: Assistente pessoal. Publicado no YouTube em 2026-10-25.

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